इंसान से भगवान और उनके भक्त….

भारत में गुरु और शिष्य परम्परा कई हज़ारों सालों से चली आ रही है। जहाँ शिष्य गुरु के सानिध्य में रहकर ज्ञान प्राप्त करता है और अपने जीवन के मार्ग को स्वयं खोजता है। यहाँ ध्यान देने वाली बात यह है की गुरु शिष्य को अपना मार्ग ढूँढने के लिए सिर्फ़ मार्गदर्शन करता ना की उसको रास्ता बताता है की क्या और कैसे करना है। चलिए पहले हम ये जान लेते है की भारतीय गुरु शिष्य परम्परा है क्या, और उससे भी पहले समझते है भारतीय दर्शन क्या है।

भारतीय दर्शन कहता है कि आत्मा (जीव) परमात्मा (ईश्वर) का ही एक हिस्सा है जो इस सांसारिक गतिविधियों की वजह से ईश्वर से दूर चला गया है और आत्मा का अंतरिम उद्देश्य परमात्मा में विलीन होना है। और व्यक्ति उस मार्ग में जितना आगे बढ़ेगा वो आनंद प्राप्त करेगा। उस मार्ग पर ले जाने के लिए गुरु आपका मर्गदर्शन करता है, लेकिन यहाँ सवाल ये उठता है की गुरु कौन है?

भारतीय दर्शन का एक आकर्षण ये भी है, की ये आपको ये नहीं बताता कि क्या सही है क्या ग़लत है, क्या सत्य है, क्या असत्य है। यहाँ किसी सवाल का सीधा या एक जवाब नहीं है, की आपके लिए क्या सही है क्या ग़लत है। क्या सत्य है क्या असत्य। भारतीय दर्शन कहता है कि सबका सत्य और असत्य, सही और ग़लत अलग-अलग होता। सबको अपना मार्ग स्वयं ढूँढना पड़ता है गुरु सिर्फ़ एक दर्पण की तरह रहता है जो आपके के द्वंदो से आपको निकालने में मदद करता है।

इन सबका तात्पर्य ये है की सबके लिए केवल एक मार्ग सही नहीं हो सकता, सबका सत्य एक नहीं सो सकता। अपना मार्ग हमें स्वयं ढूँढना पड़ेगा। कोई और आपको नहीं बता सकता की आपके लिए क्या सत्य है और आपके लिए जीवन जीने मार्ग क्या है। गुरु आपके लिए निर्णय नहीं ले सकता, गुरु आपके ऊपर अपने विचार नहीं थोप सकता। गुरु सिर्फ़ आपको एक अनुकूल वातावरण दे सकता है, आपको जीवन के विभिन्न पहलुओं को दिखा सकता है। परंतु आपको अपने जीवन का मार्ग स्वयं ढूँढना होगा।

अब आती है बात इंसान रूपी भगवान की और उनकी भक्ति की। आज की भाग दौड़ भरी ज़िंदगी और निराशा, जिससे आज का समाज ग्रस्त है। निराशा से ग्रस्त समाज को चाहिए कि उनको कोई आशा दे सके झूठी ही सही। सहारा दे सके दिखावे के लिए ही सही।क्यों की उनका अपने ऊपर से विश्वास उठता जा रहा है। सबको सब कुछ चाहिए और जल्दी चाहिए और करना भी कुछ ना पड़े। और जिनको सब कुछ सांसारिक मिल गया है पर शांति नहीं मिली क्योंकि उन्होंने अभी तक उसके बारे में सोचा ही नही, वो शांति ढूँढते है। और ये सब सिर्फ़ बिना कुछ किए चमत्कार से मिल सकता है और चमत्कार तो सिर्फ़ कोई इंसान रूपी भगवान कर सकते है क्योंकि भगवान तो आने से रहे।

यही मानसिकता व्यक्ति को इंसान रूपी भगवान के पास ले जाती है, और वो अन्ध्भक्त बनता है। और भक्त जो अंधा हो वो कुछ भी कर सकता। और कुछ लोग इन अंधे लोगों का उपयोग अपने फ़ायदे के लिए करते है, चाहे औरों को डराने की लिए हो, चाहे वो वोटबैंक कि तौर पे हो, चाहे वो कोई और दुकान हो, ये कहानी सिर्फ़ किसी एक धर्म या जाति की नहीं सबकी है, कम से कम हिंदुस्तान की तो।

अगर समाज को इस से बाहर निकलना है तो अपने ऊपर विश्वास करना सिखाना होगा। वरना ये ऐसे ही चलता रहेगा। इसके लिए हम सब ज़िम्मेदार है कोई और नहीं।

अतुल वर्मा

२६.०८.२०१७

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